Sunday, February 7, 2010

वह शब्द .. अपनापन लिये हुए
और
अब
निःशब्द वक्त

वे रेखाएं .. सीधी व तिरछी
वक्त के कैनवास पर
और
अब
कोरा कैनवास वक्त का

वो रंग .. रंग-बिरंग अनुभूति
और
अब
जैसे सातो रंगो को
अपने अंदर समेटे
सफेद की उदासी ..

शायद ये सब है
बदलते वक्त
का तकाजा़ ..

क्योंकि
गर्मी फिर बरसात और फिर ठंड
और फिर से गर्मी ..
ये तो सिलसिला है ..
वक्त का ..

कि .. चुपके से .. बदलता है वक्त

आशावादी होकर
मैं सोच रहा था ..

- जेएसबी

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